Nepal: आज की दुनिया सोशल मीडिया पर टिकी हुई है। यह सिर्फ एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आवाज़ उठाने, जुड़ने और बदलाव की पहल करने का जरिया भी बन चुका है। ऐसे में अगर किसी देश में अचानक सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तो सोचिए, सबसे ज़्यादा असर किस पर पड़ेगा? जाहिर है – जेनरेशन जेड पर।
नेपाल में कुछ ऐसा ही हुआ है, और इसी वजह से वहाँ के युवा सड़कों पर उतर आए। लेकिन हालात इतने बिगड़ गए कि प्रदर्शन झड़पों में बदल गया और 14 मासूम जानें चली गईं।? नेपाल सरकार ने हाल ही में फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और एक्स (ट्विटर) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया।
सरकार का तर्क है कि इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अफवाहें फैलाने और समाज में तनाव बढ़ाने के लिए हो रहा था। कुछ मामलों में हिंसा और अशांति भी सोशल मीडिया पोस्ट्स से भड़काई गई थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर किसी को चुप करा देना ही समाधान है?
क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाकर शांति कायम की जा सकती है? यही वजह है कि युवा पीढ़ी, खासकर जेनरेशन जेड, सरकार के इस फैसले को अपनी आज़ादी पर हमला मान रही है। नेपाल की नई पीढ़ी, जो इंटरनेट और मोबाइल के ज़माने में पली-बढ़ी है, सोशल मीडिया को अपनी “आवाज़” मानती है। यही वह प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ वे अपने विचार साझा करते हैं, सरकार से सवाल पूछते हैं और अपने अधिकारों की बात करते हैं। जब सरकार ने इन पर बैन लगाया तो युवाओं ने इसे सेंसरशिप समझा।
काठमांडू और अन्य बड़े शहरों में हजारों की संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए। उनका कहना था – “हम सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अपनी आज़ादी और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं।”
विरोध से हिंसा तक – 14 की मौत
शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे, लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी और पुलिस ने सख्ती दिखाई, हालात बेकाबू हो गए। जगह-जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। आंसू गैस, लाठीचार्ज और गोलीबारी तक की नौबत आ गई।
इन टकरावों में अब तक 14 लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि दर्जनों गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह आँकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उन घरों का दर्द है जहाँ शायद कोई बेटा, भाई या दोस्त कभी वापस नहीं लौटेगा।
नेपाल सरकार का कहना है कि यह प्रतिबंध अस्थायी है और सिर्फ कानून-व्यवस्था को स्थिर करने के लिए लगाया गया है। लेकिन जनता इसे “लोकतंत्र का गला घोंटना” मान रही है।
विपक्षी दलों ने भी सरकार पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि अगर हर असहमति को दबाने के लिए सोशल मीडिया बंद किया जाने लगा, तो देश में लोकतंत्र की आत्मा ही खत्म हो जाएगी।
जेनरेशन जेड का संदेश
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि जेनरेशन जेड अब चुप बैठने वाली पीढ़ी नहीं है। वे मानते हैं कि डिजिटल आज़ादी उनकी पहचान है, और अगर उसे छीना जाएगा तो वे हर कीमत पर अपनी आवाज़ उठाएँगे।
नेपाल के इन विरोध प्रदर्शनों ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि आज का युवा न सिर्फ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, बल्कि उन्हें बचाने के लिए बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेगा। नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ने यह दिखा दिया है कि टेक्नोलॉजी सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति का आधार बन चुकी है।
जेनरेशन जेड का यह विरोध प्रदर्शन केवल नेपाल की लड़ाई नहीं, बल्कि हर उस युवा की लड़ाई है जो मानता है कि “बोलने और सोचने की आज़ादी किसी सरकार की मेहरबानी नहीं, बल्कि हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”
14 युवाओं की मौत एक गहरी चेतावनी है – संवाद से ही समस्याओं का हल निकलेगा, दमन से नहीं। सरकारों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया बंद करने से समस्याएँ खत्म नहीं होतीं, बल्कि और बढ़ जाती हैं।